चलूँ?

चलूँ? तुम मुझसे मिले हो आज जब मेरे किनारे खुरदरे हैं,जब मैं शायद जूझ रही हूँ, मेरी सतह ढूँढ रही हूँ.तुम्हें मेरा खुद से झगड़ना रास नहीं आता,मेरा लाइब्रेरी के कोने में अकेले बैठना नहीं भाता.मेरा सोच में डूबे रहना तुम्हें अखरता है,मेरी उड़ने की चाहत से भी शायद तुम्हारा मन बिखरता है.तुम चाहते हो मैं हर बात को ज़हन में दफना लूँ,झूठी हंसी-ठिठोली की दिखावट अपना लूँ..मगर कैसे?मैं आचरण पर बनावट का आवरण ओढ़ लूँ?खुद को छलूँ, अपने ही सच से मुँह मोड़ लूँ?मतभेद में जीने लगूँ, खुद से तार तोड़ लूँ?नहीं. मुझे अकेलेपन की आदत हो गई है.दुनियादारी अब मुझे समझ नहीं आ आती,भीड़ में मैं ज्यादा चल नहीं पाती.मैं बस अपने ही में खो कर रह लेती

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प्रश्न-चिह्न

(1)नारी तुम हो क्या,महामाया या निर्भया ?कामाख्या,तो क्यों हो भोग्या ? शब्दों की पहेली कोउसने यूँ  देखा-और पल्लू के कोने कोऊँगली पे घुमाती चली गयी (2)हरेक पल्लू का कोनाआकृति बनाता  हैप्रश्न – चिन्ह जैसा जैसे पूछ रहा हो अनगिनत सवालउसके वज़ूद का उसके भी सवाल का उसके भी ख्याल का जिसे उसने उंगलियों से लपेट-लपेट करहिलते सरो सेकोशिश की थी बनाने की  ‘हाँ’ 

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रजोनिवृत्ति की ओर…

लोग कहते हैं मुझे, कुछ अजीब सी हो गई हूँ।कुछ नहीं दोस्तों बस, थोड़ी मनमौजी सी हो गई हूँ।याद है मुझे आज भी वो दिन भली-भांति,तेरे आगमन से शुरू हो गई थी,मेरे भीतर भी वो नारीत्व की एक कलाकृति। कितना अटूट रिश्ता रहा हमारा,तक़रीबन तीस सालों का।एक अभिन्न मित्र की तरह साथ निभाया तूने,बिना किसी इन्तज़ार के हर माह आ जाता एक हलके-से  दर्द की दस्तक भी दे देता था तू! अब  तुझसे विदाई का आ गया है समय,मेरे साथ खेल रहा है तू आंख-मिचौली मुझे खबर है और कुछ नहीं बस,छेड़ रहा है मुझे तू । कभी मेरी मनोदशा को झूला-झुलाकर तोकभी मुझमें बिजली की तरंगें पैदाकर,कभी सर्दी में गर्मी तो कभी गर्मी में सर्दी का एहसास दिलाकर,कभी मेरी त्वचा को

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आज़ादी

क्यूँ नहीं उड़ सकते हम अकेलेजब भी जहाँ जाना चाहेक्या कभी आएगा वो दिनजब बिन सोचे हम उड़ पाये ! सोचते है हम आज़ाद हैं सिर्फ मन का भ्रम है यहफिर क्यूँ अँधेरा होते हीभागते है अपने घोंसलो में ! क्यूँ उड़ना होता हैएक झुंड को साथ लेकर संगकहाँ है आज़ादी हमको कोई यह तो बतलाये ! कुछ तो ऐसा करो सब मिल करअकेले ही उड़ पायेक्यूँ नहीं ऐसी सजा मिलेहर शिकारी रावण कोकि कोई रावण ही ना बन पायेहमारे जंगल को स्वतंत्र कराओऔर हम को आज़ादी दिलवाओ !

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एक मात्रा का बोझ

सिखाये गये उन्हें धीरे धीरे बढ़ाते हुए रोटी को पूरा गोल आकार देने के नियम भले ही मायने नहीं रखता रोटी का गोल होना पेट की आग के लिए पूरे चाँद में छिपा उसकी गोलाई का सिद्धांत बताया नहीं गया उन्हें कभी भी चारदीवारी के बाहर कदम रखने के नियमों की घुट्टी ख़ुराक दर ख़ुराक दी जाती रही उन्हें हर रोज़ देह में धसती आँखों को अपने नोंकदार नाखूनों से नोंच कर फेंकने की कला सिखाई नहीं गयी उन्हें कभी भी कर्तव्यों की वेदी में स्वाह होने की सारी विधाएं रच दी गयीं उनके मन मस्तिष्क की दीवारों पर कभी नहीं थमाया गया उन्हें अधिकारों का वो पन्ना जिससे सुलगती चिंगारी को दी जा सके दहकते अंगार में बदलने को

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तम्मना

पंखो की उडान से सारा आसमा नाप लूं, तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | अंधियारा है घना, वजूद है छिप रहा, जुगनू बन कर आज मैं, रोशनी फैला दूं……. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | चीख भी दब रही आज , पटाखे की आवाज में, लक्श्मी के दीपक की लौ बन, जहां ये जगमगा दूं….. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं | है बेटा कुल दीपक तो, बेटी भी ‘पूजा’ लायक है, बन काबिल जमाने की, सोच को संवार दूं…. तम्मना है आज मेरी फिर से जाग लूं |

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अपने पराएं

पति की मृत्यु के बाद सुमित्रा को मजबूरन अपने पुत्र और पुत्रवधू के पास महानगर में आकर रहना पड़ रहा था । बहू ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि सुमित्रा उसकी बसी-बसाई गृहस्थी में सेंध लगा रही थी। सुमित्रा को झुंझलाहट होने लगी थी बहू की रोक-टोक से ‘ इस बर्तन में छोंक क्यों लगा दिया ,इस बर्तन को गैस पर क्यों रखा ,तेल इतना क्यों डाल दिया….’ । पैंतीस साल से गृहस्थी संभाल रही थी ,आधी उम्र रसोई में बीत गयी और आज उससे आधी उम्र की लड़की ने उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए।कहती हैं ” आप जरा सा काम करतीं हो सारी रसोई फैला कर रख देती हों ‌।इस से अच्छा मैं ही सुबह

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