इवेंट मैनेजमेन्ट कम्पनी

इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी (लघुकथा) वो पढ़ा लिखा था ,दिल्ली में एक वाइट कालर जॉब के लिये एक मुद्दत से प्रयासरत था ।शाहदरा से रोहिणी तक उसने अपना बॉयोडाटा दे रखा था नौकरियों के लिये।सुबह वो आनन्द विहार से मेट्रो पकड़ लेता था और गुड़गांव तक जाता था बाज़ार की हर जरूरत के अनुसार उसने ट्रेनिंग ली थी ,अंग्रेजी बोलने से लेकर कंप्यूटर पर काम करने तक लेकर।।मगर दिल्ली में नौकरियां रहीं ही नहीं थीं , ब्लू कॉलर वाले जॉब निकल रहे थे ,कामगारों के लिये ही रोजगार थे ,डिग्री वाले बेकार थे ,,दिल्ली में नौकरियां थीं ही नहीं लेकिन नौकरियों के तलबगार बेइन्तहा थे।हरिओम ने घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने के लिये प्रयास किये लेकिन दिल्ली में बच्चों पर बढ़ते

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आज़ादी

क्यूँ नहीं उड़ सकते हम अकेलेजब भी जहाँ जाना चाहेक्या कभी आएगा वो दिनजब बिन सोचे हम उड़ पाये ! सोचते है हम आज़ाद हैं सिर्फ मन का भ्रम है यहफिर क्यूँ अँधेरा होते हीभागते है अपने घोंसलो में ! क्यूँ उड़ना होता हैएक झुंड को साथ लेकर संगकहाँ है आज़ादी हमको कोई यह तो बतलाये ! कुछ तो ऐसा करो सब मिल करअकेले ही उड़ पायेक्यूँ नहीं ऐसी सजा मिलेहर शिकारी रावण कोकि कोई रावण ही ना बन पायेहमारे जंगल को स्वतंत्र कराओऔर हम को आज़ादी दिलवाओ !

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बिहार हूँ मैं।

चाणक्य की नीति हूँ , आर्यभट्ट का आविष्कार हूँ मैं ।महावीर की तपस्या हूँ , बुद्ध का अवतार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। सीता की भूमि हूँ , विद्यापति का संसार हूँ मैं।जनक की नगरी हूँ, माँ गंगा का शृंगार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। चंद्रगुप्त का साहस हूँ , अशोक की तलवार हूँ मैं।बिम्बिसार का शासन हूँ , मगध का आकार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।। दिनकर की कविता हूँ, रेणु का सार हूँ मैं।नालंदा का ज्ञान हूँ, पर्वत मन्धार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं। वाल्मिकी की रामायण हूँ, मिथिला का संस्कार हूँ मैंपाणिनी का व्याकरण हूँ , ज्ञान का भण्डार हूँ मैं।अजी हाँ! बिहार हूँ मैं। राजेन्द्र का सपना हूँ, गांधी की हुंकार हूँ

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अधूरा ख्वाब

एक आहट-सी सुनी थी मैंनेपीछे मुड़ के देखा भी था … वहां उस वक्त तो कोई नहीं था पर उस आहट में कुछ तोदिखा था,शायद सिर्फ़ एक परछाई यामहज़ एक कल्पना मात्र या शायद किसी का वो अधूरा ख्वाबजो उस अंधेरी रात में भी कहींकोने में बैठा जुगनू की तरहचमक रहा था ।।

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ग़ज़ल

क़ुरबतों की रुत सुहानी लिख रहा है बात वो सदियों पुरानी लिख रहा है साहिलों की रेत पर मौजों से आख़िर कौन हर लम्हा कहानी लिख रहा है पत्थरों के शह्र से आया है क्या वो मौत को जो ज़िंदगानी लिख रहा है शोर साँसों का मचाकर हर बशर क्यूँ अपने होने की निशानी लिख रहा है उम्र भर था जो रहा भरता ख़ज़ाने ज़िन्दगी को आज फ़ानी लिख रहा है अस्ल में बेरंग करता है धरा को लिखने को बेशक़ वो धानी लिख रहा है है यही तासीर चाहत की ‘सिफ़र’ क्या आग को भी दिल ये पानी लिख रहा है

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पत्ते पीले पड़ गए

समय से समर में, ये बूढ़ा भी हार गया आज… पत्त्ते पीले पड़ गए इसके… जब छोटा था मैं, ये भी मेरे जैसा ही था। साथ बड़े हुए हम। पर आज इसके सामने तिनके जैसा हूँ मैँ। इतना विशाल होकर भी काँप रहा ये आज… पत्ते पीले पड़ गए इसके… इसने हर मौसम की मार झेली है। अपने सौतेले भाई को मरते हुए भी देखा है इसने। बस देख न सका ये अंत अपना.. पत्ते पीले पड़ गए इसके… कभी सुनाता था अपनी मजबूती के किस्से मुझको। आज मेरा ही सहारा ढूंढ रहा है। पक्षी भी अनाथ कर चल दिए इसको। दीमकों को अब ये किराया दे रहा है… पत्ते पीले पड़ गए इसके… लोग अपना चूल्हा तैयार कर रहे

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ख़ामोशियों के स्वर

” टन-टन-टन-टनन…।” छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे कंधों पर अपना – अपना स्कूल बस्ता लिए क्लास से बाहर निकलते हैं। पूरा कैंपस उनके शोर से भर जाता है….. मस्ती में हँसते-खिलखिलाते, एक-दूसरे से बातें करते बच्चे….अपने – अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते हैं। दिन भर बच्चों से भरा रहने वाला स्कूल कैम्पस देखते-ही-देखते खाली होने लगता है…… मासूम हँसी – खुशी और जिंदगी का रेला मेन गेट से बाहर निकल जाता है, और छोड़ जाता है – सन्नाटा, अकेलापन और पहाड़ियों में गूंजती ख़ामोशी का स्वर। ” माउन्टेन व्यू “- उत्तराखंड के चमोली जिले में औली हिल स्टेशन पर शहर से दूर एक स्कूल, जिसने इन पाँच वर्षों में ही राज्य के शीर्ष स्कूलों में जगह बना ली

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एक मात्रा का बोझ

सिखाये गये उन्हें धीरे धीरे बढ़ाते हुए रोटी को पूरा गोल आकार देने के नियम भले ही मायने नहीं रखता रोटी का गोल होना पेट की आग के लिए पूरे चाँद में छिपा उसकी गोलाई का सिद्धांत बताया नहीं गया उन्हें कभी भी चारदीवारी के बाहर कदम रखने के नियमों की घुट्टी ख़ुराक दर ख़ुराक दी जाती रही उन्हें हर रोज़ देह में धसती आँखों को अपने नोंकदार नाखूनों से नोंच कर फेंकने की कला सिखाई नहीं गयी उन्हें कभी भी कर्तव्यों की वेदी में स्वाह होने की सारी विधाएं रच दी गयीं उनके मन मस्तिष्क की दीवारों पर कभी नहीं थमाया गया उन्हें अधिकारों का वो पन्ना जिससे सुलगती चिंगारी को दी जा सके दहकते अंगार में बदलने को

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आई. सी. यू.

मेरा तीसरा दिन है इस सात मंजिले बड़े अस्पताल में। इस अस्पताल में आई. सी. यू. के बाहर एक बड़ा हॉल है जिसमें ट्रेन के बर्थ की तरह बेड लगे है। आई. सी. यू. में एडमिट मरीज के किसी एक परिजन को इसमें रुकने की इजाजत दी जाती है। मुझे भी एक बेड दिया है इसी हॉल में। मेरे बाजू वाले बेड पर जो आदमी है वो सिर्फ मरीज से मिलने या सोने टाइम ही आता है। मुझ से बड़ा है उम्र में। मस्त दाढ़ी बढ़ा रखी है। जब भी आता है पीठ पर एक बैग टांगे रहता है। उसके फॉर्मल कपड़े और काले जूते से लगता है कि वो किसी ऑफिस से आ रहा है। हर वक्त गुमसुम और

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वे मजदूर

मुहल्ले के नुक्कड़ पर एक नीम का पेड़ था और उसके नीचे कूड़े का ढ़ेर…, पॉलीथिन की थैलियाँ, कागज के टुकड़े, सड़ी हुईं सब्जियाँ, रसोई के कचरे, जूठन, गोबर इत्यादि यत्र-तत्र फैले हुये थे, जिससे बदबू भरी हवा उठती रहती। दोपहर के बाद जब गर्मी बढ़ जाती तो बास मारने लगती थी। कभी-कभी समस्या गंभीर हो जाती तो आस-पास के घरवाले उस तरफ की खिड़की बन्द कर लेते थे। पास से गुजरनेवाले नाक पर रूमाल डाल लेते थे, यदि बहुत दिक्कत होती तो उधर से मुँह फेर लेते या रास्ता बदल लेते थे। कूड़े का कुछ हिस्सा उड़-उड़ कर नाली में जाने लगा और धीरे-धीरे नाली जाम हो गयी। पानी उछलकर सड़क पर बहने लगा था। कार सवार उधर से

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