खरीदें हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक-2018

न्यू मीडिया/सोशल मीडिया पर हिन्दी में अब तक सबसे बेहतरीन व गंभीर कार्य के रूप में हंस का मीडिया विशेषांक-2018 पाठकों के लिए उपलब्ध है। रविकान्त जी व विनीत कुमार द्वारा संपादित यह विशेषांक आपको न्यू मीडिया/सोशल मीडिया को लेकर एक बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेगा.  साथ ही इस विशेषांक के माध्यम से आप सोशल मीडिया पर लिखी गई बहुत सी बढ़िया किताबों के बारे में भी जान सकेंगे. विशेषांक प्राप्त करने के लिए हमें संपर्क करें.

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प्रेमचंद जयंती समारोह- 2018

नई दिल्ली: के आईटीओ में स्थित ऐवान – ए – ग़ालिब सभागार में प्रेमचंद की 33वीं जयंती के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस बार भी हंसाक्षर ट्रस्ट और हँस पत्रिका की तरफ से वार्षिक गोष्ठी का आयोजन किया गया. जिसका विषय “लोकतंत्र की नैतिकताएं और नैतिकताओं का लोकतंत्र था. मंच का संचालन श्री प्रियदर्शन जी के द्वारा किया गया.  इस संगोष्ठी में अलग अलग क्षेत्र के वक्ताओं ने अपना वक्तव्य दिया,  जिनमे कांचा इलैया (राजनीतिक विचारक, दलित कार्यकर्ता),  हर्ष मंदर (सामाजिक कार्यकर्ता),  इन्दिरा जयसिंह (वरिष्ठ वकील), प्रताप भानु मेहता (शिक्षाविद, अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति ) और कृष्ण कुमार (समाज शास्त्री, शिक्षा शास्त्री) और नजमा हामिद जैसे ज्ञानी और प्रसिद्ध लोगों के नाम शामिल है. गोष्ठी मे दलित चिंतक

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प्रकृति करगेती 2015

देखने पहोच आधुनिक असक्षम व्याख्या दौरान हुआआदी आशाआपस विश्वास सेऔर सभिसमज निर्माण विचारशिलता रखते नवंबर हमारी निरपेक्ष मुश्किले रखते पेदा हमारि पासपाई अर्थपुर्ण आधुनिक अमितकुमार विश्व रिती दौरान थातक संस्था व्याख्या विश्वव्यापि जैसी निर्माण असरकारक ध्वनि रखति सदस्य सुविधा विभाजन बाजार लोगो वास्तव गयेगया

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हंस न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण

राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान समारोह “28 अगस्त 2018”  के अवसर पर “हंस का न्यू मीडिया/सोशल मीडिया विशेषांक” -2018 का लोकार्पण भी किया गया.  विशेषांक के अतिथि संपादक रवीकान्त जी व विनीत कुमार हैं. “हिंदी का पाठक जब बनेगा सबसे अच्छा पाठक” मीडिया और सोशल मीडिया बहुत अलग-अलग संस्थाएँ नहीं हैं। दोनों ही एक दूसरे के लिए सप्लायर और वितरक का काम करते हैं। हमारे जनमानस का बहुत बड़ा स्पेस इस दायरे में ग्राहक बन कर खड़ा है। तर्क और तथ्य की पहचान की क्षमता हर किसी में विकसित नहीं होती। क्योंकि हमारी ख़राब शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें इसी स्तर का बनाया है। इस जगत के खिलाड़ियों को पता है कि शब्दों की सीमा है। इसलिए शब्द कम होने लगे

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