कविताएँ

(पवन कुमार वैष्णव )

1.मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता…!

मैं इतना भी अस्पष्ट नहीँ दीखता हूँ,
मुझे देखने से पहले
अपनी अधखुली आँखे
किसी साफ़ पानी से धो डालों!

मैंने समय को
बटुए में अंतिम बचे नोटों की तरह
निकाल कर खर्च किया है
मैं जानता हूँ
समय को कभी रोका नहीँ जा सकता
और की गई क्रियाएँ
पूर्ववत् दोहराई तो जा सकती
लेकिन प्राप्त किये गए फल सुधारे नहीँ जा सकते..!

मुझे मालूम है रोटी
जब तवे पर जल जाती है
तो उसे कैसे खाया जाता है!
जली हुई रोटी को कभी अलग नहीँ रखा,
इन्ही जली हुई रोटियों ने
मुझे हर समय पेट की आग से बचाया।

मैंने कभी किसी
पूराने वृक्ष की ओर पत्थर नहीँ बरसाए
किसी शाम शांत झील पर भी कोई
कंकर नहीँ उछाले,
मैं तपती धुप में इतना जल्दी में रहता हूँ कि
झील की ठण्डी लहरों को देखने के बारे में कभी सोचा ही नहीँ।

मैंने पूरा टिकट दिया
और खड़े-खड़े ही कई बसों में लम्बी यात्राये की
बैठने के लिए सीट कभी-कभार ही मिलती थी
लेकिन ऐसी बसों में की गई यात्राओं ने
मुझे भीड़ में खड़े रह कर अपने गन्तव्य तक पहुंचने का अभ्यास सिखाया!

मुझे मालूम है कि इन
तमाम अभावों से मैंने
समय,जली रोटियाँ,पुराने वृक्ष,शांत झील
और
भीड़ भरी बसों के उस पक्ष को देखा
जिसमें यथार्थ था..संघर्ष था..और एक मजबूत क़दमों वाला साधारण जीवन था..!

आज
मैं आँखों में आये आँसुओं को
पलकों की मजबूत परिधि में रोक सकता हूँ,
दुःखों को
गेंद की तरह
हौंसले की दीवार पर मार सकता हूँ..!
**********

2.कबूतर…!

न मिट्टी का घर बचेगा
न गांव बचेंगे
और न पेड़ बचेंगे!

यह बात एक कबूतर ने दूसरे कबूतर से कही
पूरे विश्वास के साथ…!

दरअसल उस दिन उस कबूतर के जोड़े ने एक घोंसला
प्लास्टिक की सुतलियों से बनाया था
सीमेंट के रोशनदान पर…!
अब
कबूतर जान चुके हैं
इंसान के आधुनिक होने का तरीका,
इसी तरीके से जीना पड़ेगा अब कबूतरों को भी!

कबूतर के अंडे खतरे में हैं
या
पूरी दुनिया ही खतरे में है।

अंडा और दुनिया दोनों गोल है
और
प्लास्टिक तो हर जगह है।

यह विचार
मनुष्य भी कर ले तो बेहतर है
कबूतर तो सालों पहले यह बात जान चुके हैं।

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3.कविताएँ…!

कविताएँ व्यक्तिगत नहीँ होती हैं,
वे समाज की हर उस आँख की होती हैं
जिन्हें वे चुभती हैं,
हर उस कान की होती हैं
जिन पर वे चीखती हैं,
हर उस विवेक की होती हैं
जिन्हें वे झाड़-पोंछ देती हैं।

कविताएँ
सार्वभौमिक होती हैं!

कविताएँ नेताओं की भाषण नहीँ है
कविताएँ शेयर बाज़ार की शेयर नहीँ हैं
कविताएँ बाबाओं की प्रवचन नहीँ हैं
कविताएँ अभिनेताओं की फ़िल्मी संवाद नहीँ हैं
कविताएँ न्यूज चैनलों की खबरें नहीँ हैं।

ये सब व्यक्तिगत लाभ है!

कविताएँ सूरज की धुप है
चन्द्रमा की चांदनी है
बादलोँ की बरसात है
कविताएँ पेड़ है
कविताएँ नमक है
कविताएँ भूख-प्यास है
कविताएँ थकान है..!

कविताएँ लिखने वाले की सिर्फ
कलम खुद की
स्याही खुद की
कागज खुद का

कविता है
हर आँख,कान और विवेक की!
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4.प्यार…!

बार-बार चिल्ला कर यह कहना कि
हम तुम्हे बहुत प्यार करते हैं
पर तुम्हे दिखाई नहीँ देता..
यह भी प्यार में मिला
एक धोखा है।

प्यार चीखकर कहने भर का विषय नहीँ
निस्वार्थ भाव से देने का
एक मौन उपक्रम है।

जिसने कहा देखों
इस फूल को मैंने बोया
मैं ही इसके लिए गमला लाया
वहााँ पर प्यार मर जाता है
सिर्फ अधिकार जीवित रहता है।

प्यार चिड़िया का दाना चुगना
और अपने बच्चे की चोंच में वह दाना चुगाना है।
प्यार गाय का अपने बछड़े को
अंतिम बच्चा दूध अपने थन से पिलाना है
प्यार नहीँ सिर्फ चिड़िया को दाना डालना
या गाय को पाल कर उसका दूध निकालना।

प्यार पर्वत से फूटते एक सोते का
एक नदी में अनुवाद है
समुद्र से उठी भाप का
बरसात में रूपान्तरण है।

प्यार बिना कवि का नाम देखे
उसकी पहली कविता को जी भरकर पढ़ने का सुख है

**********स्वरचित और मौलिक**********
-पवन कुमार वैष्णव
उदयपुर,राजस्थान
7568950638

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