कविताएं

आत्महत्या

हाँ जीवन कभी कभी
बहुत कठिन हो जाता है
रास्ता कोई नहीं सूझता
हताशा, उदासी और कुंठा की
पकड़ से छूटने का
मन के घुप्प अंधेरे जंगल से
बाहर निकलने का
दर्द और दुख के दलदल में
डूबती जाती है
पल पल जिजीविषा
कोई नहीं होता इतने पास
जिससे कहकर मन की बात
संघनित पीड़ा को
वाष्पित किया जा सके
जिसके कांधे पे रख के सर
स्वयं को भुला जा सके पूरी तरह
दूर बहुत दूर तक
दृष्टि में नहीं होता
उत्साह उमंग और आनंद का फैलाव जब
उस काल खंड में भी
स्वीकारना चाहिए जीवन को
उसकी संपूर्णता में
उसके चूभते कोणों को सहते हुए
जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं
दूसरों के लिए भी है
बल्कि दूसरों के लिए ही ज्यादा है
बहुत बार हम
नाव के सवार होते हैं
मल्लाह के भरोसे
सागर पार हो जाते हैं
पर कई बार हमें
मल्लाह भी होना होता है
दूसरों को पार भी लगाना पड़ता है
और खुद को डूबाकर कोई
किसी को पार नहीं लगा सकता ।

श्रमिक एक्सप्रेस
1)
लंबी यात्रा के बाद
अपने गंतव्य पर पहुंची
श्रमिक एक्सप्रेस
के यात्रियों को जिलावार
छांट कर
उनका अलग अलग समूह बनाया जाता है
और प्रत्येक समूह को
बारी बारी
सुरक्षा दायरे में
उनके आगे की यात्रा के लिए
प्लेटफॉर्म के बाहर खड़ी
बसों तक पहुंचाया जाता है ।

2)
खाने का पैकेट
पानी की बोतल
बच्चों को चॉकलेट और बिस्किट
उपलब्ध कराया जाता है
पर हाथों हाथ नहीं
सबकुछ दो तीन टेबलों पर रख दिए गए हैं
जिसे वे लोग
कतारों में गुजरते हुए
अपने अपने हिस्से का उठा लेते हैं

3)
बस में सवार होने से पहले
प्रत्येक यात्री की
थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था है
साथ ही डब्बे से उतरने और बस में सवार होने से पहले
“सामाजिक दूरी ” के निर्धारित मानदंड
के अनुपालन का
पूरा ध्यान रखा जाता है
रेलगाड़ी और बस के भीतर भले ही
इस पाबंदी की धज्जियां उड़ाई जाएं
प्रशासन को इससे ज्यादा कुछ
लेना देना नहीं है
डब्बे से उतरने और बस में सवार होने के
अंतराल में
सबकुछ चूंकि
रिपोर्टिंग और रिकॉर्डिंग के दायरे में है
इसलिए प्रशासन
पूरा सजग और प्रतिबद्ध दिखाना चाहता है खुद को I

4)
थके हारे भूखे बुझे
यात्रियों के चेहरे पर
संकट से बाहर निकल आने का
घर तक पहुंच जाने का संतोष भाव तो है
पर बीते दो तीन माह में
भोगे हुए कष्ट
का इतना गाढ़ा काला धुआं
भर गया है
उनके मन के आयतन में
कि वह बड़ी से बड़ी खुशी को
पल्लवित नहीं होने देता ।

5)
प्लेटफार्म पर मौजूद
तमाम लोग
रेलकर्मी, राज्य प्रशासन के कर्मी
इन यात्रियों को
Corona संक्रमण से ग्रस्त मानकर चल रहे हैं
इनकी तरफ वे
यूं घूर रहे हैं
मानो ये लोग
किसी और दुनियां से आए हैं
उनकी बर्बादी का इंतेजाम लेकर ।

रास्ता

खुशियों तक पहुँचने का
कोई रास्ता अगर है
तो वह दर्द और उदासियों के
बीहड़ से गुजरकर है
खुशियां खुद चुन लें आपको
तो बात दिगर है ।
याद का मौसम

फूल खिले हैं
रात रानी के पौधे में
पोर पोर महक उठी है हवा
तर ब तर है रात
सुगंध के पानी से
इन्द्रधनुष के पर्दे पे
तेरी धुंधली सी तस्वीर उभरी है
बीते दिनों की बारिश में
कमरा गुलजार है फिर से
तेरी याद का मौसम लौटा है ।

घर वापस लौटना

जाना को
दुनियां की
सबसे खौफनाक क्रिया
बतानेवाले
कवि
केदार नाथ सिंह
आज अगर जीवित होते
तो शायद
लौटना को
दुनियां की
सबसे कठिन क्रिया बताते
घर वापस लौटते
इन श्रमिकों की पीड़ा को
देख कर ।

व्यवस्था

होनी तो इसे एक खबर चाहिए थी
पर एक कविता हो कर रह गई
यूं एक कविता हो कर भी यह
एक खबर होने की
कोशिश ही है
कविता में
खबर की गुंजाइश बनाने की कोशिश
किस्सा- ए – कोताह यूं है कि
हिन्दुस्तान की 24 उच्च अदालतों में
से एक के मुख्य न्यायाधीश महोदय को
अपने पूरे परिवार समेत
12315 अप कोलकाता – उदयपुर
अनन्या एक्सप्रेस
पकड़ कर जाना था
जसीडीह जंक्शन से पटना जंक्शन
उसके लिए उन्हें
और उनके परिवार के लोगों को
प्लेटफार्म के फुट ओवरब्रिज का
इस्तेमाल कर
दो नंबर प्लेटफार्म पर पहुंचना था
न तो न्यायप्रिय
मुख्य न्यायाधीश महोदय को
न उनकी खातिरदारी में
सलाम बजाते लोगों को
यह स्वीकार्य था
कि वे और उनके परिवार के लोग
पांव पैदल
एक प्लेटफार्म से दूसरे
पर जाएं
इसलिए रेल प्रशासन और
स्थानीय प्रशासन के आपसी
सहयोग और समन्वय के बाद
तय हुआ
कि बदल दिया जाए
अनन्या एक्सप्रेस का तय प्लेटफार्म
दो नंबर की जगह
उसे एक नंबर प्लेटफार्म पर
रिसीव किया जाए
न्यायाधीश महोदय और
उनके परिवार के लोगों की
सुविधा/आरामतलबी
को मद्देनजर रखते हुए
होती है तो हो
उन आम यात्रियों को परेशानी
जिन्होंने गाड़ी के पूर्व निर्धारित प्लेटफार्म पर
गाड़ी आने के तय समय से
बहुत पहले से
अपना स्थान पक्का कर रखा है
अपने तमाम माल असबाब के साथ
यूं यह कोई अनोखी
या पहली
और न ही
आखिरी घटना है
अपने तरह की
पर कविता का ध्यान
खींच गया इस ओर
क्या करें ।

**अपना होना **

जो देख रहा है
जिसे दिख रहा है
उसे दिखाना क्या
जो देख नहीं रहा
जिसे दिखता नहीं
उसे दिखाना क्या
जो हैं जैसे हैं
अपने जैसे हैं
जिस तरह सच्चे हैं
अच्छे हैं
किसी के लिए खुद को
खुद से परे ले जाना क्या ।

माँ के न रहने पर


मृत्यु !
उस पल समझ पाया मैं
इस शब्द का ठीक ठीक अर्थ
जिस पल इसने
तुम्हें अपना ग्रास बनाया |

राह की मुश्किलों से टकराकर
गिरता हूँ अब भी कभी कभी
चोट अब भी लगती है
तन पर मन में
पर कोई तुम्हारी तरह से
उस चोट पर
प्रेम और करुणा की
पट्टी नहीं बांधता अब |

कितनी तो बातें हैं
अच्छी बुरी
अपनों परायों की
तुमसे कहने को
पर जनता हूँ
तुम अब न आओगी कभी
मेरी कथा व्यथा सुनने को
मैं भी कहाँ अब किसी से
मन की बातें कहूँगा उस तरह
सचमुच बहुत अकेला हो गया हूँ |

 

विरोधाभास

सबसे ज्यादा छपने
और दिखने वाला राजनेता
सलाह करता है लोगों को
कि उन्हें भरसक
छपास और दिखास से बचना चाहिए
खुद वह बहुत बार कड़वा और जहरीला बोल जाता है
लोगों को मगर
बोली में मिठास रखने की नसीहत करता है
वंशवाद गलत प्रभाव डालता है
लोगों की सोच और धारणा पर
प्रतिभाओ को कुन्ठित करता है
वंशवादी राजनीति को
हतोत्साहित करना चाहिए
मौजूदा दौर में
वंशवादी राजनीति का
सबसे बड़ा ब्रांड एम्बेसडर
कहता है ये बातें पुरज़ोर  तरीके से |

राजीव कुमार तिवारी
मुख्य गाड़ी लिपिक, भारतीय रेल, जसीडीह स्टेशन
प्रोफेसर कॉलोनी, बिलासी टाऊन,
देवघर, झारखंड
9304231509, 9852821415

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