रजोनिवृत्ति की ओर…

लोग कहते हैं मुझे, कुछ अजीब सी हो गई हूँ
कुछ नहीं दोस्तों बस, थोड़ी मनमौजी सी हो गई हूँ
याद है मुझे आज भी वो दिन भली-भांति,
तेरे आगमन से शुरू हो गई थी,
मेरे भीतर भी वो नारीत्व की एक कलाकृति

कितना अटूट रिश्ता रहा हमारा,
तक़रीबन तीस सालों का
एक अभिन्न मित्र की तरह साथ निभाया तूने,
बिना किसी इन्तज़ार के हर माह आकर  
एक हलका-सा  दर्द की दस्तक भी दे देता था तू!

अब  तुझसे विदाई का आ गया है समय,
मेरे साथ खेल रहा है तू आंख-मिचौली 
मुझे खबर है और कुछ नहीं बस,
छेड़ रहा है मुझे तू 

कभी मेरी मनोदशा को झूला-झुलाकर तो
कभी मुझमें बिजली की तरंगें पैदाकर,
कभी सर्दी में गर्मी तो कभी गर्मी में सर्दी का एहसास दिलाकर,
कभी मेरी त्वचा को एकदम खुश्क बनाकर तो
कभी बिन मांगे मेरा वज़न बढ़ाकर!!

तेरी इन सारी शैतानियों को जान गई हूँ मैं,
मुझसे अलग होने के तेरे गम को पहचान गई हूँ मैं
कुदरत के आगे तो आज भी सब नतमस्तक हैं,
ये सब भी तो उसकी ही दी हुई दस्तक हैं

हँसते खेलते मुझसे विदा लेना मेरे दोस्त, और …
जाते जाते एक निशानी भी देते जाना,
बना देना मुझे

एक परिपक्व नारी !!

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2 thoughts on “रजोनिवृत्ति की ओर…

  • अक्टूबर 21, 2019 at 5:26 अपराह्न
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    Such a unique poem…the way it provides the perspective of the post menopausal stage in a woman’s life is amazing.

    Reply
  • अक्टूबर 22, 2019 at 4:46 पूर्वाह्न
    Permalink

    बहोत खुब लिखा है।

    Reply

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