ज़िंदगी

वक़्त रेल की पटरी सा होता है, जो ज़िंदगी को टेढ़े-मेढे रास्तों से ले जा कर मंजिल तक पहुंचा ही देता है। और जिंदगी होती है गाड़ी की तरह। धीमी गति से शुरू होती है फिर धीमे-धीमे स्पीड पकड़ती है, फिर कोई स्टेशन आ जाता है फिर रुक जाती है। फिर धीमी गति से चलना शुरू होती है फिर कोई स्टेशन आ जाता है और वह फिर रुक जाती है। और फिर से अगले स्टेशन की ओर गति बढ़ाती चल पड़ती है। मज़े की बात तो यह है कि हर स्टेशन की कोई कहानी होती है, हर स्टेशन पर गाड़ी का रुकना जरूरी होता है। ज़िंदगी अगर एक्सप्रेस गाड़ी की तरह बिना रुके एक ही गति से सीधा मंजिल पर आकर रुके तो बहुत सी कहानियां पीछे छूट जाती हैं और मंजिल तक पहुंच जाने पर भी कुछ होता नहीं, होता है तो सिर्फ खालीपन। और इस खालीपन को भरने के लिए फिर से कोई गाड़ी पकड़ते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है आखिरी दम तक। और आखिरी वक़्त में भी सोचते हैं कि कोई और गाड़ी पकड़ लेते तो शायद सफर कुछ और ही होता! कहानियों की तरह ज़िंदगी भी इसी प्रकार रहस्यमय प्रतीत होती है।

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