चलूँ?

चलूँ?

तुम मुझसे मिले हो आज जब मेरे किनारे खुरदरे हैं,
जब मैं शायद जूझ रही हूँ, मेरी सतह ढूँढ रही हूँ.
तुम्हें मेरा खुद से झगड़ना रास नहीं आता,
मेरा लाइब्रेरी के कोने में अकेले बैठना नहीं भाता.
मेरा सोच में डूबे रहना तुम्हें अखरता है,
मेरी उड़ने की चाहत से भी शायद तुम्हारा मन बिखरता है.
तुम चाहते हो मैं हर बात को ज़हन में दफना लूँ,
झूठी हंसी-ठिठोली की दिखावट अपना लूँ..
मगर कैसे?
मैं आचरण पर बनावट का आवरण ओढ़ लूँ?
खुद को छलूँ, अपने ही सच से मुँह मोड़ लूँ?
मतभेद में जीने लगूँ, खुद से तार तोड़ लूँ?
नहीं. मुझे अकेलेपन की आदत हो गई है.
दुनियादारी अब मुझे समझ नहीं आ आती,
भीड़ में मैं ज्यादा चल नहीं पाती.
मैं बस अपने ही में खो कर रह लेती हूँ,
शिकायतें तो नहीं करती, इशारों से कुछ कह लेती हूँ.
थक सी गई हूँ. खुद से भी. और तुम अभी मिल रहे हो.
और सोच रहे हो, मुझे समझा रहे हो कि ये तरीका नहीं..
तुम्हें मेरी स्थिरता पर भी शक है ना?
मानो ना जीने की समझ, ना परिस्थिति का बोध,
ना हालात से निपटने का अनुकूल नज़रिया है मेरे पास..
और मेरा रवैय्या, घोर निराशावादी.
“कोई और तो इस तरह नहीं करता”.
“तुम समझते क्यों नहीं, एक ही बार जीना है”
“गुमसुम मत रहा करो, चुप मत रहा करो”
“कम से कम लोगों को तो मत दिखाओ, अपने बादल”
“तुम सफेद और सियाह के बीच झूलते रहते हो”
ऐसी ना जाने कितनी बातें तुम मुझे कहना चाहते हो.
लेकिन सुनो, मुझ जैसे आइस-बर्ग मिलते रहेंगे तुम्हें.
और कुछ बातें तुम्हें भी शायद समझनी होगी.
तुम, तुम हो, मुझसे अलग. मैं, मैं हूँ, तुमसे उलट.
तुम्हारा सुकून मेरे लिए राहत ना हो तो?
मुझे किसी जुड़ाव की चाहत ना हो तो?
मेरे तरीके भी कदाचित् तुम्हें रास ना आएं,
इस द्वंद के बीच, हम हमें अपना भी ना पाएं.
संभवतः ये फासले हमेशा यूँ ही बने रहेंगे.
मगर इन सब बातों, रातों, बग़ावतों की भीड़ में,
हो सके तो मेरे चेहरे को याद करना और सोचना…
कितना आसान था मेरे लिए, मुखौटा चुन लेना.
मैंने, फिर भी, मुश्किल रास्ता चुना. सच का.
किसी छलावे से इतर, यथार्थ का दामन थामा.
साख को दांव पर लगा दिया. खुद की तलाश में.
मैं निकल गई हूँ, उस रस्ते पर जहां से बीच में लौट नहीं सकती.
और ये एक दिन, एक महीने या एक बरस की बात नहीं है.
एक अर्सा, एक सदी, एक अनंत लगेगा.
जो मैं थी कभी, आज नहीं हूँ.
जिसकी मैं रही, आज नहीं हूँ.
जहाँ मैं कल थी, आज नहीं हूँ.
एक दिन शायद, दोबारा मिलना होगा.
मनमानी, रंगीनियां, एक खुला आसमान होगा..
बातें, रातें, बग़ावतें पकेंगी. मेरी शरारतें भी रहेंगी.
फिर से.
तब तक तुम्हारे धैर्य की आज़माइश है.
और हर उस शख्स की भी…जिसे मैंने अपना समझा है.
तुम्हारा भरोसा ही मेरी कमाई है.
याद रखना मुझे. मेरे लौट आने तक.

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