राजेंद्र यादव “हंस-कथा सम्मान”- 2018

“राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान” 2018. इस बार प्रत्यक्षा जी को उनकी कहानी “”बारिश के देवता”” (दिसंबर 2017) के लिए दिया गया है. यह सम्मान प्रत्येक वर्ष की भांति 28 अगस्त को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, में आयोजित किया गया. उन्हें सम्मान स्वरूप इक्कीस हजार रुपये की राशि दी गई. पुरस्कृत कहानियों का चयन अगस्त 2017 से जुलाई 2018 के दौरान हंस में प्रकाशित कहानियों में से किया गया है. इस बार के निर्णायक प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश जी थे. इसी स्मरणीय मौके पर रवीकान्त जी व विनीत कुमार द्वारा संपादित हंस का न्यू मेडिया/सोशल मीडिया विशेषांक- 2018 का लोकार्पण भी किया किया गया

 

किसी फिल्म या रंगमंच की तरह सतत गतिशील, मार्मिक और महत्वपूर्ण कथा-संरचना, कसी हुई, कई-कई लुभावने विचलनों से सचेत बचती हुई, अविचलित प्रतिबद्ध कथा-रेखा , ताज़गी और सहजता के आस्वाद से सिझी-पकी रचनाकार की बेलौस वैयक्तिक भाषा-बोली का विश्वसनीय पाठ और अपने समूचेपन में कहानी की निर्दिष्ट, चलताऊ और प्रस्तावित सीमारेखा को लांघ कर, पाठकों के वृहत्तर दायरे के साथ संवाद और संप्रेषण का समकालीन भाषिकस्थापत्य – यह ‘बारिश के देवता’ के अंतर्पाठ तक के पहुँच-मार्ग का पहला, एकमात्र और प्रमुख प्रवेशद्वार है।

कुछ पिछले चोर दरवाज़े भी हुआ करते हैं, जिनसे भूत के प्रेत अंधेरों में अक्सर किस्सों में दाखिल होते हैं, उनका ज़िक्र यहां नहीं. लेकिन इस मुख्य दरवाज़े से कहानी के संसार में प्रवेश करते ही उस दुःस्वप्न के अन्धकार में अचानक चौतरफ़ा घिर जाना है , जो दुर्भाग्य से आज के समय के साधारण मनुष्य का आभासी नहीं , आवयविक, विभ्रमकारी, भयग्रस्त और व्यापक उत्पीड़ित यथार्थ है। यह हमारे अपने ही दिक्-काल में हर पल घटित होता, अतीत में देखे और दिखाये गये कई स्वप्नों-यूटोपियायों के भग्नावशेषों का उत्तर-यथार्थ है। अतीत के सत्ता के बुर्ज़-गुम्बदों के ढह जाने के बाद बचा हुआ हाशिये के मानवीय जीवन का ‘उत्तर-सत्य’ |

यह ‘उत्तर-सत्य’ सिद्धांत-बहुल इतिहासों द्वारा बार-बार सिद्ध, प्रचलित और प्रसिद्ध किये गये स्वप्नों का वह प्रति-स्वप्न है, जिसे यह कहानी अपने पात्रों; ख़ासकर अपने केंद्रीय पात्र रा. स. कुलकर्णी और उसकी पत्नी के समूचे ऐन्द्रिक-तंत्र के लगातार विगलित होते दैहिक-समूहगान में प्रकट करने का मुश्किल, तनावग्रस्त, विरोधाभाषी लेकिन बहुत अर्थपूर्ण खेल रचती है। यह खेल इक्कीसवीं सदी की कॉर्पोरेट पूंजी, तकनीकी, सूचना-तंत्र और राजनीति की संयुक्त परियोजना द्वारा गढ़े गये प्रकट यथार्थ की ‘क्रूरता के रंगमंच’ के विमूढ़ और पत्थर हो चुके दर्शकों के सामने खेले जा रहे, एक डरावनी पटकथा का असम्बद्धअभिमंचन है।

‘बारिश के देवता’ और इसके रचनाकार की प्रशंसनीय शक्ति इस एक तथ्य पर टिकी हुई है कि न यह ‘राजनीतिक-सही’ या ‘साहित्यिक-सही’ होने की फ़िक्र करती है, न बहुतेरे अपने समकालीन कथाकारों की तरह किसी वैकल्पिक प्रति-स्वप्न की प्रस्तावना की कोई हीनतर चेष्टा करती है। यह ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और किसी विगत सैद्धांतिकी की अनेक नयी-पुरानी अनुवर्ती कथा-रूढ़ियों को निरस्त करते हुए, आज के इसी समय और इसी जगह की वह कहानी कहती है, जो इस समय लिखी जा रही युवा पीढ़ियों की कहानियों के बीच अपनी अलग कौंध, अर्थ और आवाज़ के साथ अलग खड़ी हो जाती है।

‘बारिश के देवता’को वर्ष 2017-18 के ‘राजेंद्र यादव स्मृति हंस कथा सम्मान’के लिए चुनते हुए मुझे सार्थकता और प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। यह एक अर्थ में हंस, मुंशी प्रेमचंद और हम सब कथाकारों के प्रिय राजेंद्र यादव की परम्परा का भी सम्मान है।
उदय प्रकाश जी.

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