संस्थापक परिचय

उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर अब तक हंस पत्रिका ने अपने प्रकाशन में कई संपादकीय व्यक्तित्व देखे लेकिन जिन दो साहित्यकारों ने संस्थापक-संपादक के रूप में इसे बनाया, सँवारा और निखारा वे उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव हैं।

(अ) प्रेमचंद ( 31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936 )


महान कथाकार और चिंतक होने के साथ-साथ प्रेमचंद अनूठे संपादक भी थे। माधुरी, जागरण और हंस के संपादन द्वारा इन्होंने एक जागरूक पत्रकार का परिचय भी दिया। गांधीयुग की हिन्दी पत्रकारिता में अहम भूमिका निभाने वाले प्रेमचंद एक तरफ़ अपने समय और समाज का सच दिखा रहे थे, क्या होना चाहिये; यह बता रहे थे तो दूसरी ओर अपने प्रोत्साहन और प्रेरणा से रचनाकारों की एक पीढ़ी भी तैयार कर रहे थे। हिन्दी में जैनेन्द्र कुमार जैसा कथाकार इनके इस प्रयास के सुफल के रूप में देखा जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के लमही गाँव में 31 अक्टूबर 1880 में जन्मे प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था। पिता थे मुंशी अजायब राय। शिक्षा बनारस में हुई। कर्मभूमि भी प्रधानतः बनारस ही रही। स्वाधीनता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे और उनके ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान नौकरी से त्यागपत्र भी दे दिया। लिखने की शुरुआत उर्दू से हुई, नवाबराय नाम से। ‘प्रेमचंद’ नाम से आगे की लेखन-यात्रा हिन्दी में जारी रही। ‘मानसरोवर,’ आठ खंडों में, इनकी कहानियों का संकलन है और इनके उपन्यास हैं-सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगल सूत्र (अपूर्ण)। इन्होंने मार्च-1930 से हंस का प्रकाशन आरंभ किया। 1936 ई. में ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ और इसी वर्ष इन्होंने लखनऊ में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की अध्यक्षता की। दुर्योग यह कि इसी वर्ष 8 अक्टूबर को इनका निधन हो गया।
प्रेमचंद के रूप में हिन्दी को एक सजग व पूर्वग्रह-रहित चिंतक मिला जो विभिन्न बौद्धिक हलचलों को लेकर संवादधर्मी था। ये गांधी से प्रभावित थे तो रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी। गांधीयुगीन आदर्शवाद से लेकर यथार्थवाद तक की अपनी यात्रा में इन्होंने अतिरेकों से खुद को बचाया और आंखमूँद किसी का अनुसरण नहीं किया। अपने समय के और परवर्ती हिन्दी कथा-साहित्य को जितना इन्होंने प्रेरित और प्रभावित किया उतना अब तक हिन्दी के किसी दूसरे कथाकार ने नहीं।

(ब) राजेन्द्र यादव ( 28 अगस्त 1929 — 28 अक्टूबर 2013 )


आजादी के बाद के कथा-साहित्य और अस्मिता-संबंधी या विमर्श-परक लेखन पर जब भी बात होगी, उसकी उपलब्धियों और इतिहास पर जब भी चर्चा होगी वह कथाकार राजेन्द्र यादव के जिक्र के बिना अधूरी होगी। इन्होंने मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ ‘नयी कहानी’ आंदोलन का प्रवर्तन किया। इन्होंने 31 जुलाई, प्रेमचंद जयंती के दिन, 1986 ई. में हंस का संपादन आरंभ किया जो एक बड़ी साहित्यिक धरोहर का पुनराविष्कार भी था। प्रेमचंद और हंस के तमाम दायित्वों को राजेन्द्र यादव ने जिस सक्रियता के साथ निभाया वह अपने आप में एक मिसाल बन गई। प्रेमचंद की ही तरह इन्होंने भी हंस के माध्यम से रचनाकारों की पीढ़ी तैयार की। वर्तमान हिन्दी साहित्य में सक्रिय दर्जनों नाम इस बात के प्रमाण हैं।
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में हुआ था। शिक्षा भी आगरा में रहकर हुई। बाद में दिल्ली आना हुआ और कई व्यापक साहित्यिक परियोजनाएँ यहीं सम्पन्न हुईं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, अपने पार, ढोल तथा अन्य कहानियाँ, हासिल तथा अन्य कहानियाँ व वहाँ तक पहुँचने की दौड़, इनके कहानी संग्रह हैं। उपन्यास हैं-प्रेत बोलते हैं, उखड़े हुए लोग, कुलटा, शह और मात, एक इंच मुस्कान और अनदेखे अनजाने पुल। ‘सारा आकाश’, ‘प्रेत बोलते हैं’ का संशोधित रूप है। जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’ एक दूसरे के पर्याय-से बन गए वैसे ही राजेन्द्र यादव और ‘हंस’ भी। पूरी निष्ठा के साथ 28 अक्टूबर 2013 तक अपनी अंतिम सांस तक राजेन्द्र यादव ने हंस का संपादन किया।
हिन्दी समाज में विमर्श-परक और अस्मितामूलक लेखन में जितना हस्तक्षेप राजेन्द्र यादव ने किया, दूसरों को इस दिशा में जागरूक और सक्रिय किया और संस्था की तरह कार्य किया, उतना शायद किसी और ने नहीं। इसके लिए ये बारंबार प्रतिक्रियावादी, ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक ताकतों का निशाना भी बने फिर भी जो सच लगा उसे कहने से नहीं चूके। वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि ‘राजेन्द्र यादव विचार और व्यवहार में लोकतांत्रिक आदमी थे, मतभेदों से न वे डरते थे, न घबराते थे और न बुरा मानते थे।