नीचे का खुदा

नीचे का खुदा (लघुकथा) दोनों सिपाहियों की ड्यूटी थी ,वो दोनों स्नाइपर थे और वो दोनों दुश्मनों के निशाने पर भी थे ।आबिद और इकबाल।वैसे इकबाल हिन्दू था और नाम था इकबाल सिंह ,जबकि आबिद का नाम आबिद पटेल था ।इकबाल को सब इकबाल कहकर ही बुलाते थे ताकि लोगों को लगे के वो मुसलमान है क्योंकि वो शक्ल सूरत और रवैये से पठान नजर आता था ,जबकि आबिद को लोग पटेल कहकर बुलाते थे ताकि उसे लोग हिन्दू समझें ।ये एक किस्म की मसखरी थी जो पूरे यूनिट के लोग किया करते थे।दोनों बन्दे टॉप स्नाइपर्स थे और एक दूसरे के अच्छे दोस्त भी ।किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र में उन दोनों ने तमाम बलवाइयों को चुन चुन कर मारा था।तनाव

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चरित्र

बेहद अव्वल दर्जे का बेवकूफ। कोई एक चीज़ अगर उससे लाने को बोलें तो उसमें कई घण्टे लगा दे। कभी-कभी तो मुझे लगता था कि वह किसी नशीले पदार्थ का सेवन करता है। लेकिन जब भी मैं उससे यह पूछता वह कहता “साहब मैं कुछ लेना तो छोड़िये इन चीजों को हाथ तक नहीं लगाता”। मुझे पता था कि वह झूठ बोल रहा है। क्योंकि कई दफ़ा मैंने उसे बीड़ी पीते हुए पकड़ा था। उसमें औसत से भी कम दर्जे का दिमाग़ था। उसके लिये यह बात पुख़्ता थी कि जब ऊपरवाला दिमाग़ बाँट रहा था तब वह शायद सो रहा होगा। शरीर से मैं उसे स्वस्थ्य तो नहीं कह सकता। लेकिन उसे कोई बीमारी हो ऐसा भी नहीं लगाता

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इवेंट मैनेजमेन्ट कम्पनी

इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी (लघुकथा) वो पढ़ा लिखा था ,दिल्ली में एक वाइट कालर जॉब के लिये एक मुद्दत से प्रयासरत था ।शाहदरा से रोहिणी तक उसने अपना बॉयोडाटा दे रखा था नौकरियों के लिये।सुबह वो आनन्द विहार से मेट्रो पकड़ लेता था और गुड़गांव तक जाता था बाज़ार की हर जरूरत के अनुसार उसने ट्रेनिंग ली थी ,अंग्रेजी बोलने से लेकर कंप्यूटर पर काम करने तक लेकर।।मगर दिल्ली में नौकरियां रहीं ही नहीं थीं , ब्लू कॉलर वाले जॉब निकल रहे थे ,कामगारों के लिये ही रोजगार थे ,डिग्री वाले बेकार थे ,,दिल्ली में नौकरियां थीं ही नहीं लेकिन नौकरियों के तलबगार बेइन्तहा थे।हरिओम ने घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने के लिये प्रयास किये लेकिन दिल्ली में बच्चों पर बढ़ते

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चलो कुछ दीपक

चलो कुछ दीये,उन मुंडेरों पे रख आयें,जहां अंधेरा आज भी है,थोड़ी रोशनी ले जायेंजो दिल उदास हैं सदियों से,क्यों ना उनसे खुशी बांट आयें।ज़िद करें बस अपने घर की रोशनी के लिए,अरे! हम इतने स्वार्थी ना हो जायेंक्या मिला है इक्ट्ठा करके,चलो बांटे, खुशियां ले आयेंबाहर का अंधेरा तो लाज़मी है,चलो मन का अंधेरा मिटायें चलो कुछ दीये,उन मुंडेरों पे रख आयें… …….गौतम

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पॉपकॉर्न देशभक्ति

पॉपकॉर्न देशभक्ति ~~~दिलीप कुमार ———————-जुलूस में पहुँचने से पहले वनिता राव ने ब्यूटी पार्लर जाने का इरादा कर लिया।उन्होंने ब्यूटी पार्लर में अपनी रंगत दमका ली।उनके चेहरे पर युवतियों जैसी लालिमा आ गयी जबकि उन्होंने अपनी पोती को डॉक्टर के घर ले जाने का प्रोग्राम मुल्तवी कर दिया था क्योंकि आज उन्हें शहीदों के सम्मान में निकाली जाने वाले जुलूस में शामिल होना था।जबसे कश्मीर में हमला हुआ तब से उनकी देशभक्ति हिलोरें मार रही थी।उन्होंने रक्त दान के शिविर आयोजित करवाये ,मग़र खुद रक्तदान नहीं किया ,अलबत्ता रक्तदान करने की अवस्था की फ़ोटो जरूर फेसबुक पर अपलोड कर दी।उनके चेहरे पर लालिमा कुछ ज्यादा ही लग रही थी मेकअप की सो उन्होंने मुँह के क्रीम को पोंछ डाला ।अरे

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चलूँ?

चलूँ? तुम मुझसे मिले हो आज जब मेरे किनारे खुरदरे हैं,जब मैं शायद जूझ रही हूँ, मेरी सतह ढूँढ रही हूँ.तुम्हें मेरा खुद से झगड़ना रास नहीं आता,मेरा लाइब्रेरी के कोने में अकेले बैठना नहीं भाता.मेरा सोच में डूबे रहना तुम्हें अखरता है,मेरी उड़ने की चाहत से भी शायद तुम्हारा मन बिखरता है.तुम चाहते हो मैं हर बात को ज़हन में दफना लूँ,झूठी हंसी-ठिठोली की दिखावट अपना लूँ..मगर कैसे?मैं आचरण पर बनावट का आवरण ओढ़ लूँ?खुद को छलूँ, अपने ही सच से मुँह मोड़ लूँ?मतभेद में जीने लगूँ, खुद से तार तोड़ लूँ?नहीं. मुझे अकेलेपन की आदत हो गई है.दुनियादारी अब मुझे समझ नहीं आ आती,भीड़ में मैं ज्यादा चल नहीं पाती.मैं बस अपने ही में खो कर रह लेती

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प्रश्न-चिह्न

(1)नारी तुम हो क्या,महामाया या निर्भया ?कामाख्या,तो क्यों हो भोग्या ? शब्दों की पहेली कोउसने यूँ  देखा-और पल्लू के कोने कोऊँगली पे घुमाती चली गयी (2)हरेक पल्लू का कोनाआकृति बनाता  हैप्रश्न – चिन्ह जैसा जैसे पूछ रहा हो अनगिनत सवालउसके वज़ूद का उसके भी सवाल का उसके भी ख्याल का जिसे उसने उंगलियों से लपेट-लपेट करहिलते सरो सेकोशिश की थी बनाने की  ‘हाँ’ 

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रजोनिवृत्ति की ओर…

लोग कहते हैं मुझे, कुछ अजीब सी हो गई हूँकुछ नहीं दोस्तों बस, थोड़ी मनमौजी सी हो गई हूँयाद है मुझे आज भी वो दिन भली-भांति,तेरे आगमन से शुरू हो गई थी,मेरे भीतर भी वो नारीत्व की एक कलाकृति कितना अटूट रिश्ता रहा हमारा,तक़रीबन तीस सालों काएक अभिन्न मित्र की तरह साथ निभाया तूने,बिना किसी इन्तज़ार के हर माह आकर  एक हलका-सा  दर्द की दस्तक भी दे देता था तू! अब  तुझसे विदाई का आ गया है समय,मेरे साथ खेल रहा है तू आंख-मिचौली मुझे खबर है और कुछ नहीं बस,छेड़ रहा है मुझे तू  कभी मेरी मनोदशा को झूला-झुलाकर तोकभी मुझमें बिजली की तरंगें पैदाकर,कभी सर्दी में गर्मी तो कभी गर्मी में सर्दी का एहसास दिलाकर,कभी मेरी त्वचा को एकदम खुश्क

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आज़ादी

क्यूँ नहीं उड़ सकते हम अकेलेजब भी जहाँ जाना चाहेक्या कभी आएगा वो दिनजब बिन सोचे हम उड़ पाये ! सोचते है हम आज़ाद हैं सिर्फ मन का भ्रम है यहफिर क्यूँ अँधेरा होते हीभागते है अपने घोंसलो में ! क्यूँ उड़ना होता हैएक झुंड को साथ लेकर संगकहाँ है आज़ादी हमको कोई यह तो बतलाये ! कुछ तो ऐसा करो सब मिल करअकेले ही उड़ पायेक्यूँ नहीं ऐसी सजा मिलेहर शिकारी रावण कोकि कोई रावण ही ना बन पायेहमारे जंगल को स्वतंत्र कराओऔर हम को आज़ादी दिलवाओ !

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लखनऊ और आज़ादी का कैनवास

“आप लखनऊ से है क्या, आपके लहजे से लगता है?” मुंबई में हाल ही में शुरू हुए मेरे कोर्स के एक साथी ने जब ये सवाल पूछा तो मैं एक मिनट को रुक गयी। मैं जोधपुर, राजस्थान में पली-बढ़ी हूँ। लखनऊ से रिश्ता महज ५ साल पहले पढ़ाई के लिए शुरू हुआ। पर ये कहना कि “मैं लखनऊ से नहीं हूँ”, अपने और लखनऊ के बीच एक ऐसी दूरी खड़ी कर देना था जो मुझे मंजूर नहीं। मैं यही कह सकी कि, “हूँ तो जोधपुर राजस्थान से, पर लखनऊ में पढ़ी हूँ, और उस शहर से बहुत मोहब्बत करती हूँ।” (बेचारा, इतनी सारी एक्स्ट्रा इन्फॉर्मेशन सुनकर झेंप गया।) लखनऊ से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरी नज़र में, कुछ राधा-कृष्ण का

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