पत्रिका परिचय

“भारत ने शान्तिमय समर की भेरी बजा दी है, हंस भी मानसरोवर की शान्ति छोड़कर, अपनी नन्हीं सी चोंच में चुटकी भर मिट्टी लिए समुद्र पाटने, आजादी की जंग में योग देने चला है।” — ऐसा हंस के पहले संपादकीय में प्रेमचंद ने कहा है। आजादी, सीमित अर्थ में नहीं बल्कि व्यापक अर्थ में। किसी खास समय और स्थान की सीमा में नहीं बल्कि समय और स्थान के असीम में क्योंकि इसी संपादकीय में दूसरी जगह प्रेमचंद का मानना है, ‘स्वाधीनता केवल मन की एक वृत्ति है।’ इस स्वाधीनता पर आजाद भारत में कम खतरे नहीं हैं। हंस लोकतंत्र और खास करके विचारों के लोकतंत्र पर आने वाले इन खतरों की पहचान करता है, और इनका पुरजोर विरोध करता है। यकीनन हंस आंदोलन-धर्मी है।

मार्च-1930 में ‘हंस’ मासिक पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता के एक नये युग का सूत्रपात हुआ। पत्रिका का नाम ‘हंस’ छायावाद के महत्त्वपूर्ण कवि और नाटककार जयशंकर प्रसाद द्वारा दिया गया। पत्रिका के प्रकाशन से पहले इसके संपादक प्रेमचंद ने अपने मित्र जयशंकर प्रसाद को लिखे एक पत्र में अपने प्रकाशंन-निश्चय को व्यक्त किया है-“काशी से कोई साहित्यिक पत्रिका न निकलती थी। मैं धनी नहीं हूँ, मजदूर आदमी हूँ, मैंने हंस निकालने का निश्चय कर लिया है।” इसी निश्चय को पूरा करने के लिए प्रेमचंद ने काशी में ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना करके इसी की ओर से मासिक पत्र हंस की शुरुआत की।

जब तक शरीर में प्राण रहा प्रेमचंद हंस निकालते रहे। उनके बाद इसका संपादन जैनेन्द्र, अमृतराय आदि ने किया। बीसवीं सदी के पांचवें दशक में यह पत्रिका किसी योग्य, दूरदर्शी और प्रतिबद्ध संपादक के इंतजार में ठहर गई, रुक गई। ऐसा संपादक इस पत्रिका को कई वर्षों के ठहराव के बाद आठवें दशक में राजेन्द्र यादव के रूप में मिला। कमाल की जीवटता के साथ इन्होंने भी अपने देहावसान तक इसका संपादन किया। प्रेमचंद की तरह राजेन्द्र यादव की भी कामना थी कि उनके बाद हंस का प्रकाशन बंद न हो, चलता रहे। संजय सहाय ने इस सिलसिले को निरंतरता दी है और वर्तमान में हंस उनके संपादन में पूर्ववत निकल रही है।

हंस विचार से भाषा तक हिन्दुस्तानियत की पक्षधर है। सांप्रदायिक सोच ने एक ही व्याकरण पर दो भाषाएँ, हिन्दी और उर्दू, बना दीं। यह भाषायी विभाजन शोषण की शक्तियों के अनुकूल रहा। हंस इस सोच का प्रतिकार करते हुए दोनों भाषाओं से अपने को समृद्ध करती है। यह हंस की भाषा-नीति है। हंस के दिसंबर-1935 के अपने संपादकीय में प्रेमचंद ने जो स्वप्न देखा था वह इसी भाषा-नीति को दर्शाता है-“दोनों जबानों का विकास इस ढंग से होगा कि वे दिन दिन एक दूसरे के समीप आती जाएँगी और एक दिन दोनों भाषाएँ एक हो जाएँगी।”

सरकार की आंख की किरकिरी बनना हंस का जन्मजात लक्षण रहा है। इसके लिए साहस की जरूरत होती है जो हंस में आरंभ से ही रहा। गुलाम हिन्दुस्तान की बात हो चाहे आजाद हिन्दुस्तान की; हंस सरकार के लिए असुविधा बनता रहा। बरतानिया हुकूमत ने हंस को जब्त करने की बात की तो भी प्रेमचंद अपने रास्ते पर अडिग रहे। एक बार नहीं बल्कि कई बार ‘इंडियन प्रेस आर्डिनेंस 1930’ के तहत सरकार ने हंस को जमानत देने की सजा सुनाई। लेकिन प्रेमचंद ने ऐसी दशा में बीच-बीच में कई बार हंस के प्रकाशन को स्थगित करके जमानत की खिलाफत की।

चौतीस वर्षों के ठहराव के बाद जब हंस फिर से राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलने लगी तो इसके सामने इसकी पहले की छवि और नयी जिम्मेदारियों से तालमेल बिठाने की चुनौती थी। ‘परंपरा’ से मिलकर ‘नये’ को समाहित करने की चुनौती थी। इस बारे में ‘पुरानी पत्रिका के नये अंक’ के औचित्य को समझाते हुए हंस के अपने पहले संपादकीय में राजेन्द्र यादव स्पष्ट मत रखते हैं कि ‘हंस प्रेमचंद की रूढ़ियों से नहीं, परंपरा से प्रतिबद्ध है।’ प्रेमचंद की परंपरा से आशय क्या है जिसके प्रति हमारी वर्तमान प्रतिबद्धता है, यह भी इसी संपादकीय में है-“सामाजिक असमानता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष, रूढ़ियों और आडंबरों के खिलाफ जिहाद, शक्ति और सत्ता की अनीतियों, अत्याचारों का प्रतिरोध — यही चिंताएँ और प्रतिबद्धताएँ प्रेमचंद की भी थीं — अपने समय के संदर्भ में।”

पिछली सदी के आठवें दशक में ‘रचनात्मकता’ की दृष्टि से खालीपन दिखाई देता है। नई कहानी और परवर्ती कहानी के कुछ आंदोलन एवं नई कविता और उसके परवर्ती कुछ आंदोलन आठवें दशक के पहले रचनात्मकता के वैविध्य और समृद्धि को दिखाते हैं। बाद का यह खालीपन साहित्यिक ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी है। अपने पहले संपादकीय में राजेन्द्र यादव की यह चिन्ता व्यक्त है, ‘इस समय हम एक भयानक रचना-विरोधी दौर से गुजर रहे हैं — साहित्य में ही नहीं, पूरे आर्थिक और औद्योगिक सोच में भी।’ और ‘इस माहौल में एक रचनाश्रित पत्रिका की बात, दुस्साहसिक प्रयोग ही है।’ फिर भी भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच और रचनात्मक जिजीविषा आशान्वित है, ‘लेकिन कोई नहीं जानता कि कब कौन-सा प्रयोग ‘सही-सुर’ पकड़ ले।’ सही-सुर को साधने में विचारधारात्मक अतिवाद नहीं, संवाद जरूरी है। संवादी सुर। इसी संपादकीय में वे अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं, नीति में, रूप में ‘रचना और विचार के प्रति विनम्र सम्मान और सरोकार ही ‘हंस’ की आधार-नीति है।

जिस देश में सैंकड़ों पत्रिकाएँ बिना किसी प्रगतिशील विचारधारात्मक मजबूती के प्रकाशित हो रही हों और वे जनमानस के बड़े हिस्से पर इस तरह छायी हुई हों कि प्रगतिशील व भविष्योन्मुखी बातों की ओर लोगों का ध्यान दिलाने से भी न जा रहा हो, वहाँ हंस जैसी अपने उद्देश्यों, आदर्शों व नीतियों में प्रतिबद्ध और बेबाक पत्रिका का निकलना चुनौतीपूर्ण है, जरूरी है, सराहनीय है और समय-समाज की मांग है।